मुखाग्नि (Mukhaagni)

“अरे अरे कहाँ भागा चला आ रहा है? बाबूजी पूजा कर रहे है।  तुझे भी उनसे डांट खाये बिना चैन नहीं, है ना?” माँ तुलसी के आस पास चक्कर लगा रही थी और कनखियों से एक ओर इस बच्चे को देख रही थी। 

रोज़ सुबह सुबह सामने वाले घर से बिना नहाये चला आता है ये चार साल का नन्हा शैतान।  बाबूजी और माँ की इकलौती बेटी गंगा को अपनी दीदी बनाये हुए जाने कितनी गहराई से बहन भाई का ये रिश्ता निभा रहा है। 

घर में दौड़ता हुआ दीदी, दीदी कहाँ हो तुम, चिल्ला रहा था।  तुतलाती खनकती आवाज़ और शरारत इतनी की आँखों से बह जाएगी। 

बाबूजी रोज़ की तरह जनेऊ और धोती पहने पूजा घर की घंटी बजा रहे थे।  एक हाथ में आरती की थाली थी और इस नन्हे अली को देख कर उनका बुदबुदाना शुरू हो गया। 

“मन में राम और जुबां पर छुरा? ये कैसी पूजा?” माँ रसोई में जाते जाते बोली और बाबूजी ने धिक्कार भरी नज़रों से पहले अपनी पत्नी की ओर देखा और फिर सीढ़ियों से फुदकती हुई नीचे उतरती अपनी बिटिया को। 

धोती संभाले बाबूजी ने चप्पल पहनी और अखबार उठाकर धम्म से बरामदे में पड़े सोफे पर जा पसरे। 

“गंगा इधर आओ,” बाबूजी ने पुकारा।

“दीदी लगता है आज फिर डांट पड़ेगी,” अली ने चिढ़ाते हुए गंगा से कहा। 

“चुप कर तू।  कितनी बार कहा है नहा तो लिया कर, लेकिन तू सुनता कहाँ है? माँ इसको नाश्ता दो, मैं डांट खा कर आती हूँ। ” माँ और गंगा हंसने लगीं। 

“जी बाबूजी, आपने बुलाया?” गंगा सोफे से थोड़ी दूर खडी होकर पूछने लगी। 

“जानती हो बिटिया तुम्हारा नाम गंगा क्यों है?”

रोज़ की कहानी पर तरीका अलग अलग।  बाबूजी की सोच ज़रा पुरानी है।  भले ही उन्हें इस मोहल्ले में रहते कितने साल बीत गए, लेकिन सामने वाले मुसलमान परिवार से सख्त चिढ़ है इनको।  मास, मच्छी, जाने क्या क्या पकाते हैं ब्राह्मणों के घर के सामने ही।  बदबू से बाबूजी का मैं कलुषित हो जाता है।  और ये अली तो इन्हे एक आँख नहीं सुहाता।  ज़बरदस्ती का भाई बना फिरता है गंगा का।  समय आने पर देखेंगे की कितना फ़र्ज़ निभाता है। 

“जी बाबूजी जानती हूँ ,” सात साल की गंगा ने जब जवाब दिया तो बाबूजी ने अपने ख़याली पुलाव की आंच बुझाई और कहने लगे, “कितनी समझदार हो, उम्र से कई ज़्यादा बड़ी।  फिर क्यों उस नालायक के साथ दिन भर खेलती रहती हो ? अच्छा बताओ, क्या समझी? क्यों हमने तुम्हारा नाम गंगा रखा?”

“क्यूंकि मैं केवल बहना जानती हूँ, रुकना नही।  इसलिए मैं गंगा हूँ,” इतना कह कर गंगा खिलखिलाने लगी। 

“धत्त!” बाबूजी ने समझाया, “हमने तुम्हे गंगा नाम दिया क्यूंकि तुम पवित्र हो, निष्पाप, सबसे शुद्ध,” बाबूजी के चेहरे पे गर्व का भाव था, “जो तुम्हारे समीप आये, वो भी अपने पाप धुल ले, इतनी साफ़।  गंगा तो शांत है।  उसमे सब अपना सहारा ढूंढ़ते हैं।  जो आये वही निर्मल हो जाए, सब भूल जाए।  गंगा स्थिर है।  गंगा अशांत और मैली नहीं हो सकती।  कुछ समझी बिटिया ?”

“इसका मतलब तो ये हुआ बाबूजी की गंगा सबकी है , है ना?” इतना कह कर गंगा माँ के पुकारे जाने पर तेज़ी से अंदर दौड़ गई। 

“ये नहीं सुधरेगी।  बाबूजी ने झल्लाते हुए अखबार झटका और पढ़ने लगे, “अरे चाय मिलेगी या आओ-भगत में ही लगी रहोगी ?” अपनी पत्नी को चिढचिढाते हुए बोले। 

“ला रही हूँ, बच्चों को नाश्ता तो करवा दूँ, ” अंदर से आवाज़ आई। “आलू का परांठा और ले लेना अली बेट।  गंगा, भाई का ख्याल रखना।  मैं बाबूजी को चाय देकर आती हूँ। “

माँ ने जैसे रोज़ का जिम्मा उठा रखा है।  इस घर में खाना तीन लोगों का नहीं , चार का बनता है।  उसके बाद गैया, पक्षी और गली के कुत्ते भी माँ की ओर उम्मीद भरी नज़रों से ताकते रहते हैं।  दिन भर रतना इसी सबमे व्यस्त रहती हैं।  बैठने की फुर्सत नहीं और कहने वाले कहते हैं की करती ही क्या हो घर पर पूरा दिन?

बिटिया भले ही सात साल की है लेकिन रतना लगभग 38 बरस की होने जा रही हैं।  बहुत लम्बे इलाज, कितने पूजा पाठ और निराशाओं के बाद गंगा हुई।  रतना तो चाहती थीं की बेटा हो जाता, ताकि दुसरे बच्चे का झमेला ही ना रहता और सब एक बार में ही शांत हो जाते।  समाज में रहना भी अजीब विडंबना है।  खैर, बिटिया भी इनकी भगवान की नेमत ही है।  इतनी समझदार की जो देखे प्रशंसा किये बिना ना रुके।  अच्छी चीज़ें बनाने में भगवान् को भी समय लगता है, शायद इसलिए गंगा देरी से हुई।  रतना यही सोच कर संतोष कर लेती हैं। 

सामने वाली नुसरत का भी कुछ ऐसा ही हाल था।  शादी के कई साल गुज़र जाने के बाद भी जब औलाद नहीं हुई , तो उनके पति ने घर छोड़ दिया और उनको लेकर इस मोहल्ले में आ गए।  साथ ही एक नवजात बच्चा भी था। गोद लिया हुआ था तो क्या , अली था तो उन दोनों की आँखों का तारा ही। 

इसलिए रतना के पति चाहे कुछ भी कहें, नुसरत और रतना एक दुसरे से अपने एक जैसे दर्द की कड़ी से जुडी हुई हैं।  एक सा दर्द केवल वही समझ सकता है जो एक से तूफ़ान में एक साथ फंसा हो।  तूफ़ान गुज़र जाने पर साहिल पर खड़े लोग केवल सांत्वना दे सकते हैं, समझ नहीं सकते। 

अली को मास-मच्छी कभी रास नहीं आया।  उसको तो सामने वाली माँ के हाथ की पूरी, कचौरी, दाल- चावल, बेसन के पकौड़े, केवल यही सब अच्छा लगता है।  सुबह से शाम तक रतना के घर रहता है और गंगा के साथ खेलता है।  

बाबूजी की अली को डांट पहले तो नुसरत को बहुत परेशान करती थी, लेकिन अब हंसाती है।  नुसरत और रतना खूब हंसती हैं जब गंगा धोती लपेट के और जनेऊ पेहेन के बाबूजी की नक़ल करती है। 

इसी सब में यूं ही कई साल बीत गए।

गंगा मुंबई में अब डॉक्टर है और अली बतौर IPS अफसर दिल्ली में अपनी पहली पोस्टिंग काट रहा है। 

कितने रक्षाबंधन बीत गए , मगर मजाल है कि गंगा ने एक पर भी अली को राखी न भेजी हो।  अली भी सबको यही बताता है कि हम दो भाई बहन हैं। 

वीडियो कालिंग के ज़माने में एक दुसरे से जुड़े रहना बहुत आसान है, अगर कोई चाहे तो। 

“शुक्र है भगवान् का।  नज़र से दूर, दिल से दूर,” बाबूजी बहुत खुश हुए थे जब गंगा का एडमिशन मेडिकल कॉलेज में हुआ था।  उन्हें लगा था अली नाम कि बला से अब पीछा छूटेगा। 

शायद अली बाबूजी को उनकी दबी हुई इच्छाएं याद करवाता है।  धर्म कि चादर में बाबूजी खुद को ढक लेते हैं।  इच्छा तो थी बेटे कि।  आखिर उनके जाने के बाद उन्हें मुखाग्नि कौन देगा? मुक्ति कैसे मिलेगी ? बेटा होता तो बिलकुल अली जैसा – इतना ही नटखट, बहन के लिए इतना ही मर मिटने वाला और माँ का आँचल पकडे खाने कि ऐसी ही फरमाइशें करने वाला।  बच्चा है तो प्यारा , लेकिन परारे धर्म का।  स्वीकार कर पाना कठिन है। 

“बाबूजी फासले तो केवल दिल में होते हैं, नज़रों का क्या दोष? कोई कहीं भी रहे, मन में प्यार हो और रिश्ता सच्चा हो तो कहीं से भी निभाया जा सकता ह।  अपनी अपनी सोच है,” गंगा शब्दों का जाल अच्छा बुनती है।  इससे बातों में जीत पाना असंभव है।  तर्क- वितर्क तो ऐसे कि सामने वाला परास्त होकर ही माने। 

“अली, जल्द से जल्द मुझे फ़ोन करो।  तुम्हे कितनी बार कॉल किया, तुम फ़ोन क्यों नहीं उठा रहे?” गंगा ने अली को Whatsapp मैसेज भेजा। 

अचानक क्या हो गया? आज गंगा अपनी कुर्सी पर बैठ ही नहीं पा रही। 

“क्या हुआ दीदी , इतनी परेशान क्यों हो?” अली ने फ़ोन करके पूछा। 

“सुबह माँ का फ़ोन आया था।  उन्होंने तुम्हे भी बहुत बार किया, लेकिन शायद तुम व्यस्त थे।  बाबूजी रोज़ की तरह सुबह सैर पर गए और वापस आकर बेहोश हो गए।  अभी तक होश में नहीं हैं।  मैंने वहां के डॉक्टर से बात कर ली है।  स्थिति ठीक नहीं है।  लगता है अब कुछ ठीक नहीं होगा।  तुम कब तक आ जाओगे भाई ?”

अली के पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गई।  उसके कानों में बाबूजी कि आवाज़ गूंजने लगी।  बाबूजी कि डांट, उनका झल्लाना, उनकी चिड़चिड़ाहट- जैसे सब सामने दिखाई देने लगा।  आँखों से कब आंसू गिरने लगे, पता ही नहीं चला।  दीदी कैसे इतनी शांत है? या एक्टिंग कर रही है खुद को मज़बूत दिखाने की? इतनी भी समझदारी किस काम की? माँ कि हालत कैसी होगी?

“अली, अली तुम सुन रहे हो ना?” गंगा कि आवाज़ एकदम स्थिर थी जैसे उसे कोई फर्क ही ना पड़ा हो !

“दीदी मैं फ्लाइट बुक कर रहा हूँ, सीधा घर पहुँचता हूँ।”

“ठीक है , मैं बुक करवा दूँ ?” गंगा ने पूछा। 

“नहीं दीदी, मैं करवा लूंगा।  तुम ठीक हो ना ?”

“घर पर मिलते हैं अली,” ये कहकर गंगा ने फ़ोन काट दिया और कुर्सी पर बैठी बैठी ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। 

भाई के सामने या माँ के सामने कैसे रोती?

गंगा तो समझदार है।  उसके पास सब आकर सहारा ढूंढ़ते हैं।  उसमे सब शान्ति खोजते हैं।  गंगा के पास जो आये, वही शांत हो जाए। जो आये वही निर्मल हो जाए।  तो गंगा अशांत कैसे हो सकती है ? गंगा को अस्थिर होने का अधिकार ही कहाँ है? बाबूजी ही तो कहते थे। 

“पुत्र के ना होने पर मुखाग्नि का अधिकार पुरुष के भाई का है।  यदि भाई भी ना हो तो नाती का।  और यदि नाती भी ना हो तो पत्नी ये काम कर सकती हैं।  शास्त्र यही कहते हैं ,” घर पर अजीब माहौल था।  पंडित जी रतना को अंतिम संस्कार की विधि समझा रहे थे। 

अली के आंसू नहीं रुक रहे थे।  उसे सब याद आ रहा था।  नन्हे क़दमों से इस घर में भाग के आना, और बाबूजी का कहना, “फिर बिना नहाये चला आया नालाय।  खुद का घर समृद्ध है।  फिर भी दिन भर यहीं पड़ा रहता है।”

“ये क्या हो गया माँ,” अली माँ में अपना सहारा खोज रहा था।  गंगा का व्यवहार तो उसकी समझ से परे है।  स्थिर और शांत चित्त रहना अच्छी बात है, लेकिन खुद को फौलाद बनाये रखना, और वो भी ऐसी स्थिति में? कैसे कर रही है वो ये सब? और है कहाँ दीदी? सब उन्हें ढूंढ रहे है।  कहाँ गयी आखिर? जब से आई है अजीब सी है। 

बाबूजी को बैकुंठ धाम ले जाने का समय आ गया।  रतना को पंडित जी मुखाग्नि कि विधि समझा रहे हैं। 

“गंगा भी साथ जाएगी,” रतना ने पंडित जी से कहा। 

“गंगा,” किसी ने आवाज़ लगाई। 

अली को तो कुछ समझ नहीं आ रहा।  दीदी पर गुस्सा भी आ रहा है।  माँ को संभाल नहीं सकती ? सब कुछ मैं ही करूँ? माँ को अपनी बेटी कि ज़रूरत है और वो है कि पता नहीं कहाँ है। 

अचानक गंगा बरामदे में आई।  आँखें और चेहरा एकदम लाल हैं और हाथ में एक पुरानी डायरी है।  गंगा को ऐसे कभी नहीं देखा।  शांत चित्त गंगा के चेहरे पे जैसे आज सैलाब उतर आया है। 

“पंडित जी, बाबूजी को मुखाग्नि माँ नहीं, अली देगा,” गंगा ने ऐलान कर दिया। 

सब चौंक गए।  किसी से ये बात हज़म नहीं हुई।  क्या कह रही है गंगा?

“दीदी, लेकिन” अली बोलते बोलते रह गया।  उसको विश्वास नहीं हुआ।  माना कि इस परिवार से उसका बचपन का नाता है , लेकिन है तो वो मुसलमान ही ना? दीदी आज सच में होश में नहीं है। 

“यही बाबूजी कि आखरी इच्छा है,” गंगा ने डायरी दिखाते हुए कहा। 

सब क्रियाकर्म होने के बाद गंगा, रतना, अली और नुसरत आश्चर्य से डायरी को देखते रहे और शून्य में तांकते हुए बाबूजी के आखरी शब्दों के बारे में सोचते रहे।

“गंगा डॉक्टर बन गई और अली IPS अफसर।  परिवार पूर्ण हो गया।  बिटिया डॉक्टर, बेटा अफसर।  एक पिता को इसके सिवा और क्या चाहिए ? धर्म एक ढोंग है।  बेटे कि दरकार थी मुक्ति के लिए।  जीवन- मुक्ति, स्वर्ग- नर्क सब यहीं है।  इतना शांत जीवन रहा।  धर्म-परायण पत्नी मिली , समझदार बिटिया और बेटे कि कमी अली ने पूर्ण कर दी।  और क्या चाहिए? बिटिया के तर्क-वितर्क ने सच मुच सोच बदल द।  सही कहती है।  गंगा तो सबकी है।  अंत में सब उसी में विलीन हैं।  लगा ही नहीं कि एक बिटिया का पिता हूँ मैं।  गर्व से सीना चौड़ा हो गया।  मुखाग्नि की भी चिंता ना रही।  ईश्वर तेरा आभार!”

Published by akanksha89

Writing for me is another word for 'breathing.' It is my addiction and I wish and hope that this addiction takes me far in realizing my dream of being a very successful writer. I believe in laughter with my friends, dipping into my thoughts and extracting some really powerful and inspiring stories. I believe in living free, spending each day with a lot more courage and strength. I love lone reading and my dream is to have a beautiful huge library in a home, with a coffee vending machine in the corner and a bean bag where I can just sit and read whatever I want- no one to disturb and no one to intrude my privacy, my "me-time." Keep Reading!! Disclaimer: All the stories on this blog are purely a work of fiction and writer's own imagination and are not copied from anywhere else. DO NOT COPY any of these stories. Also, all the characters of the stories are purely a work of fiction and imagination and have no resemblance to any person living or dead. The stories on this page are meant for recreational purpose and for readers' interest. Any action taken by any of the reader (after reading any of the story) is utterly their own responsibility.

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